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Showing posts from June 6, 2013

गीली बारिश

खोल दो खिड़कियाँ को बूंदों को अन्दर आने दो  पड़ने दो हथेलियों पर ऐसे  जैसे गरम रेत पर पानी का  mirage बन जाये ! तपती धरती सी मेरी रूह  को मिल गया सावन जैसे  आँखों में पानी ऐसे फ़ेला ऐसे  जैसे रंग फर्श पर बिखर गए हों ! जब उन् पोरों पर जाकर रुका पानी  तो उससे रॊक लेने को जी चाहा  क्योंकि पोरों से गालॊ तक की राह  पर लाख सवाल होते है  जिनका कोई जवाब नहीं होता  और न ही वो सवाल रुकते है  ज्यादा देर उस mirage की तरह जो मेरी  हथेलियों पर  आकर बन गया था  समझा तो पता लगा  उस mirage को पार करते ही  सारे सवाल और जवाब भी लुप्त हो गए !