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The Lurching eyes !

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One humid but beautiful August afternoon I decided to gift myself a walk till nearby Grocery shop. The walk was pleasant but it proved me again that nothing has changed yet in-spite of so much of hoo-hullah on women's safety and so called empowerment. The distance was not even one kilometres but I felt I have come miles away.  As soon as I left safe cocoon of the wall of my society, on the main road I met happened to see two grown up boys riding a bike. I shall call them grown up because they were driving, and I understand  in our country driving license is given after 18 years of 'grown up' age.  I was crossing the road, though there is no such concept of Zebra crossing in our country, I was looking at all sides with my ultra alert eyes. The boys were daring also, I must say. The front boy or man or MCP was blinking at me again. The moment was actually funny for me.  I was bought up in a family where blinking is like a crime and consider...

ANDAAZ

वो ठंडी हवा के झोंके ! वो उड़ते हुए पर्दे ! FM  RADIO  पर गुनगुनाते गुरु दत्त के नगमें ! बीच बीच में आती बादलों के गरजने की आवाज़ , पानी पानी की टप टप की आवाज़ कभी आती कभी बंद हो जाती ! कहीं कोई खुल्ला दरवाज़ा हवा से जोर से बजता , याद आता अचानक छत पर कुछ है तो नहीं जो भीग जायेगा ! फिर वापस आँखें किताब पर गडा देती हूँ "मंटो की अमर कहानियाँ" यह कहानियाँ भी अजीब ही होती है  ! एक बार शुरू हो जायें तो बीच में छोडी भी नहीं जाती बिलकुल जीवन की तरह , एक बार दुनिया में आजाओ तो जिंदगी की आदत से हो जाती है चाहे वोह गले से लगाये या न लगाये ! यह फुर्सत, यह लम्हे रूक  जाये अगर सोचूँ में अपनी गोल बेंत की चेयर  पर, पास रखा BAMBOO का पौधा मुरझा गया है पता नहीं क्यों? BALCONY से झांकते पीले बल्ब चमक रहे थे जैसे बारिश के पानी में आँखें धुल कर साफ़ हो गए हों ! ऐसी कोई बारिश बनानी  चाहेए जो देखने का अंदाज़ ही बदल दे ! ऐसी  कोई महक बननी चाहेए जो भीतर तक समा जाये ! ऐसी कोई रौशनी हो जो अन्धकार को चीर दे ! ऐसी कोई आव...

गीली बारिश

खोल दो खिड़कियाँ को बूंदों को अन्दर आने दो  पड़ने दो हथेलियों पर ऐसे  जैसे गरम रेत पर पानी का  mirage बन जाये ! तपती धरती सी मेरी रूह  को मिल गया सावन जैसे  आँखों में पानी ऐसे फ़ेला ऐसे  जैसे रंग फर्श पर बिखर गए हों ! जब उन् पोरों पर जाकर रुका पानी  तो उससे रॊक लेने को जी चाहा  क्योंकि पोरों से गालॊ तक की राह  पर लाख सवाल होते है  जिनका कोई जवाब नहीं होता  और न ही वो सवाल रुकते है  ज्यादा देर उस mirage की तरह जो मेरी  हथेलियों पर  आकर बन गया था  समझा तो पता लगा  उस mirage को पार करते ही  सारे सवाल और जवाब भी लुप्त हो गए !

Indifferent

It seems yesterday only, when she was a little girl, as innocent as it can be. Who can forget going to Nani Ke ghar every year. She with her cousin going out to have tiki and golgappe under scorching sun was a child's play.  Mummy scolded and commented but who was listening. She was in her dream world where things were plain simple, no complications.  Then why things turned upside down and she became an adult in a night when her cousin forced himself on her.  He was her friend, brother, mate and mentor.  She lost the meaning of relationships that ever existed. When such meanings are lost one becomes indifferent and indifference hurts the most, even more than kindness.  She is now indifferent, indifferent to the world ! 

हैप्पी बर्थडे आरिन !

वो झिलमिलाती हंसी वो आँखों में शरारत वो नन्हे हाथॊ से मुझे छूना , वो छोटी छोटी उंगलीयो से मेरे गालॊन को सहलाना वो तेरा तेज़ी से दौड़ना और मेरे ऊपर Jump लगाना ! वो तेरे ढेरॊन सवाल और उनके  मुश्किल जवाब वो तेरा Toys के लिए मचलना वो तेरा टीवी के लिए रोना वो तेरा चॉकलेट के लिए झीकना वो तेरा घूमने जाने के लिए मनाना वो तेरा लेटेस्ट फ़िल्मी गाने गाना वो तेरा TV में देखके Dance Copy करना ! वो तेरा हमेशा अपनी पसंद के कपढ़े निकाल कर पहनना और सारी अलमारी खराब कर देना वो तेरे मीठे बातें बनाना और उन्हें बार बार सुनाना वो बड़े भाई से लड़ना और फिरउसी के साथ खेलना ! यह सब कुछ सालों में खो जाने है, और तुझे एक समझदार और परिपक्व इंसान बन जाना है ! पर मैं वहीं हूँ  अभी जब तीन साल पहले तुमने आकर मेरा घर खुशबू से भर दिया था ! मैं हमेशा यहीं रहूंगी इन् नन्हे कदमॊ के साथ इन् प्यारी बातों के साथ इन् नन्ही  उंगलियों के साथ इन् शरारती आँखों में इस छोटे से आलिंगन में सदा ही ! ...

Chand ka mooh tedha hai: चलते हुए !

Chand ka mooh tedha hai: चलते हुए ! : वो हिलती हुई ट्रेन में अहसास हुआ की पीछे कुछ छुट सा गया था   दिए की लौ सी झिलमिल चलती ट्रेन ने कुछ याद दिलाया है  वो छुटते खेत  वो ...

चलते हुए !

वो हिलती हुई ट्रेन में अहसास हुआ की पीछे कुछ छुट सा गया था   दिए की लौ सी झिलमिल चलती ट्रेन ने कुछ याद दिलाया है  वो छुटते खेत  वो दौड़ते पेड़  जैसे माँ से जिद कर रहे हो हमें बाहर जाने दो न ! वो लाल सफ़ेद डिस्टेंपर से सजे घर  वो खुली छत, वो खुला आँगन  कहती है कहानी उस बिंदास अंदाज़ की  जो मेट्रो सिटी में कहाँ मिलती है  क्या अंदाज़ बदलने से कोई बिंदास जो जाता है? वो एक अकेला सा घर उस खेत में   उसमें कुछ लोग रहते होंगे  ए काश वोह भरे हों यादॊ और बेबाक बातों से  वोह छोटा सा सरसों के खेत का टुकड़ा  किसी ने बड़े यतन से बचाया होगा  कंक्रीट जंगल के ठेकेदारों से  और वो आया एक छोटा सा स्टेशन   जी में अता था की अपनी मंजिल आ जाये जल्दी ही  पर जब यह छोटे छोटे सुन्दर पढ़ाव आते है  तो जी बदल जाता है  कि सफ़र यूहीं चलता रहे  ऐसा ही कुछ होता है जीवन में  मंजिल की चाह नहीं रह जाती  न ही उसकी याद आती है...